मुल्यावृधि अनाहुत अतिथि के समान,
हमारे जीवन में आकर बैठ गई,
जर्जर कर दिया, समाज के ढांचे को,
इस महंगाई ने.
टूट गई है सबकी कमर,
कठिन हो गई है जीवन की डगर,
बढती कीमत,
बड़ते कर,
उतना ही वेतन है मगर,
गरीब होते जाएँ गरीब,
अमीरों को नहीं है डर.
आर्थिक स्तिथि है कमजोर हमारी,
ऋण ले के हमने है सुधारी,
मुल्यावृधि को रोको,
इसमें सबका कल्याण,
पुरे समाज के विकास का,
येही एक समाधान.
हमारे जीवन में आकर बैठ गई,
जर्जर कर दिया, समाज के ढांचे को,
इस महंगाई ने.
टूट गई है सबकी कमर,
कठिन हो गई है जीवन की डगर,
बढती कीमत,
बड़ते कर,
उतना ही वेतन है मगर,
गरीब होते जाएँ गरीब,
अमीरों को नहीं है डर.
आर्थिक स्तिथि है कमजोर हमारी,
ऋण ले के हमने है सुधारी,
मुल्यावृधि को रोको,
इसमें सबका कल्याण,
पुरे समाज के विकास का,
येही एक समाधान.
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